बहुत समय पूर्व की बात है। किसी बड़े नगर में एक धनाढ्य सेठ निवास करते थे। उनके पास अपार संपत्ति, विशालकाय हवेली, अनेकों नौकर-चाकरों की फौज और भरा-पूरा परिवार था। ऐश्वर्य के समस्त साधन उपलब्ध थे, किंतु एक गहरी व्यथा उन्हें सदैव व्याकुल करती थी। उन्हें रात्रि में नींद नहीं आती थी। कभी-कभार यदि नेत्र बंद भी हो जाते, तो भयानक स्वप्न उन्हें आतंकित कर देते थे। सेठ अत्यंत बेचैनी का अनुभव करते थे और मानसिक अशांति से जूझते रहते थे। उन्होंने अनेक वैद्यों और हकीमों से चिकित्सा करवाई, परंतु रोग घटने के स्थान पर दिन-प्रतिदिन और अधिक विकराल होता चला गया। एक दिन उसी नगर में एक सिद्ध तपस्वी पधारे। वे उच्च कोटि के संत थे, जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उनके बारे में कहा जाता था कि वे लोगों के समस्त दुःख-क्लेश हर लेते हैं और मन को शांति प्रदान करते हैं। जब सेठ को इस बात का पता चला, तो उन्होंने तत्काल साधु के दर्शन करने का निश्चय किया। वे अत्यंत विनम्रतापूर्वक साधु महाराज के समक्ष उपस्थित हुए और अपनी समस्या को विस्तारपूर्वक बताते हुए बोले- महाराज! मेरी यह विकट पीड़ा दूर करने की कृपा करें। मैं अपार धन-सम्पदा का स्वामी होते हुए भी सुख-चैन से वंचित हूँ। कृपया मुझे मुक्ति प्रदान करें। साधु महाराज ने गंभीरता से सेठ की बातें सुनीं और फिर संयमित स्वर में बोले- सेठजी! तुम्हारे रोग का मूल कारण यही है कि तुम अपंग हो। सेठ ने विस्मय और अविश्वास के साथ साधु की ओर देखा और पूछा- महाराज! आप मुझे अपंग कैसे कह सकते हैं? मेरे तो सभी अंग-प्रत्यंग स्वस्थ और सक्षम हैं। साधु ने मंद-मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया- वत्स! अपंग वह नहीं होता जिसके हाथ-पैर नहीं होते, बल्कि अपंग वह है जो सक्षम होने के बावजूद अपने अंगों का सदुपयोग नहीं करता। यह बताओ, तुम अपने शरीर का कितना उपयोग करते हो? क्या तुम स्वयं कोई भी कार्य अपने हाथों से करते हो? सेठ निरुत्तर हो गए। वास्तव में, वे अपने जीवन के प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य के लिए सेवकों पर निर्भर थे। उन्होंने कभी अपने हाथों से कोई श्रम नहीं किया था। साधु ने पुनः कहा- यदि तुम सचमुच इस व्याधि से मुक्ति पाना चाहते हो, तो अपने हाथ-पैरों से इतनी मेहनत करो कि थकावट से चूर हो जाओ। तुम्हारी निद्रा स्वयं ही आने लगेगी और बीमारी दो-चार दिनों में समाप्त हो जाएगी। सेठ ने साधु के निर्देशों का पालन करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने आलस्य और आरामतलबी को त्याग दिया और दिनभर श्रम करने लगे।